इस सच से पर्दा उठाती है फिल्म 'लाल रंग'! देखें ट्रेलर...

2 years ago

मुंबई : सैय्यद अहमद अफजाल की 'लाल रंग' को नजरअंदाज या दरकिनार नहीं किया जा सकता है। हिंदी की यह ठेठ फिल्म है, जिसमें एक अंचल अपनी भाषा, रंग और किरदारों के साथ मौजूद है। फिल्म का विषय नया और मौजूं है। पर्दे पर दिख रहे नए चेहरे हैं। और साथ ही पर्दे के पीछे से भी नई प्रतिभाओं का योगदान है। यह फिल्म अनगढ़, अधपकी और थोड़ी कच्ची है। यही इसकी खूबी और सीमा है, जो अंतिम प्रभाव में कसर छोड़ जाती है।

यहां लाल रंग का मतलब खून से है। खून किसी की जिंदगी बचा सकता है, लेकिन कुछ लोग इसे व्यापार बना लेते हैं। वे रक्त दान करने के बजाय रक्त ऊंचे दामों में अवैध तरीके से बेचते हैं। इन रक्त माफियाओं के काम करने के तरीके के इर्दगिर्द घूमती है 'लाल रंग'।

किसी अच्छे कलाकार के लिए राज्य की सारे सीमाएं टूट जाती है। फिल्म ‘लाल रंग’ में देख कर लगता है कि हरियाणवी पृष्ठभूमि की इस कहानी के लिए मौजूदा दौर में रणदीप हुड्डा से बेहतर कोई और नहीं हो सकता था।

रणदीप हरियाणा के ही हैं और अपने 15 साल के अभिनय करियर में करीब तीन दर्जन से अधिक फिल्में करने के बाद यह पहला मौका है जब वो पूरी तरह से खालिस हरियाणवी अवतार में दिखे हैं।

ये कहानी है हरियाणा के करनाल शहर की। यहां का रहने वाला शंकर (रणदीप हुड्डा) का अपना ही एक स्टाइल है और उसके इसी स्टाइल का दीवाना हो जाता है राजेश धिमण (अक्षय ओबेराय) जो कि लैब असिस्टेंट बनना चाहता है। दोनों की मुलाकात एक सरकारी संस्थान में होती है। राजेश यहां पढ़ने आया है और शंकर तो यहां बार-बार छात्र बन कर आता रहता है।

दरअसल, इस संस्थान में एक ब्लड बैंक भी है, जिससे गैर-कानूनी तरीके से ब्लड बेचा जाता है। शंकर और उसका सहयोगी पुष्पेन्द्र (राजेन्द्र सेठी) जो कि ब्लड बैंक का इंचार्ज है, के साथ मिल कर ये गोरख धंधा कई सालों से चल रहा है। शंकर, राजेश को भी इस काम में अपने साथ मिला लेता है। देखते ही देखते राजेश पैसों में खेलने लगता है।

एक दिन किसी बात पर राजेश और शंकर की ठन जाती है। राजेश, शंकर से अलग हो जाता है। वह खुद ही ब्लड की सप्लाई करने लगता है और एक दिन जब किसी खास ग्रुप के ब्लड की डिमांड आती है तो वह बिना जांच किये एक व्यक्ति का ब्लड बेच देता है। बाद में पता चलता है कि जिस व्यक्ति को वह ब्लड चढ़ाया गया था, उसकी तो मौत हो गयी है, क्योंकि ब्लड एचआईवी पॉजिटिव था। जांच होती है तो राजेश और पुष्पेन्द्र दोनों लपेटे में आ जाते हैं। वैसे भी मामले की जांच पर रहे एसपी गजराज सिंह (रजनीश दुग्गल) को राजेश पर पहले से ही शक था।

गजराज, राजेश से ब्लड माफिया से जुड़े अन्य लोगों के नाम जानना चाहता है, जिसमें से एक शंकर भी है। एसपी का दबाव काम कर जाता है और राजेश, शंकर का नाम देने के लिए तैयार भी हो जाता है, लेकिन ऐन मौके पर शंकर, राजेश को घेर लेता है और फिर जो होता है, उससे सब सन्न रह जाते हैं।

इसके अलावा राजेश और शंकर की प्रेम कहानी के एंगल इसे और बोझिल कर देते हैं। यह एक थ्रिलर फिल्म हो सकती थी, लेकिन इसे दोस्ती और भाईचारे के संदेश से पाट दिया है। तमाम बुराईयों के बावजूद शंकर हीरो बन जाता है। क्या इसलिए क्योंकि वो ब्लड निकालने से पहले डोनर की जांच कर लेता था? या जरूरतमंदों की वो मदद करता था। बाद में वो एक एनजीओ खोल लेता है और मुफ्त में ब्लड बांटता है। इससे शंकर हीरो कैसे बन जाता है, समझ से परे है। ये एक असल किरदार हो, तब भी एक कुपोषित व्यक्ति की उस मौत को कैसे नजरंदाज किया जा सकता है, जिसका जिम्मेदार शंकर है।

रणदीप का हरियाणवी लहजा सबको भाता है । अब देखना है दर्शकों को यह फिल्म कितना रास आती है। वीडियो देखें...

https://www.youtube.com/watch?v=KzWsMbLwZ1M

 

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