भारतीय सिनेमा के 103 साल पूरे होने पर, जाने कुछ रोचक तथ्‍य!

2 years ago

नई दिल्‍ली : भारतीय सिनेमा के इतिहास का 7 जुलाई 1886 का वह स्‍वर्णिम दिन, जो हमेशा याद करने वाला है जिस दिन ल्‍युमेरे ब्रदर्स ने पहली बार 6 लघु चलचित्रों (शार्ट फिल्म) का प्रदर्शन किया था। जो कि, मूक फिल्‍में थी। लेकिन हम इन फिल्‍मों को भारतीय सिनेमा का मील का पत्‍थर मान सकते हैं क्‍योंकि इन्‍ही से प्रभावित होकर श्री एच.एस. भटवडेकर और श्री हीरालाल सेन नामक व्यक्तियों ने ल्युमेरे ब्रदर्स की तरह क्रमशः मुंबई और कोलकाता में लघु चलचित्रों का निर्माण प्रारंभ कर दिया। सन 1898 में हीरा लाल सेन द्वारा निर्देशित ‘The Flower of Persia’ भारत की पहली लघु चलचित्र थी।  इसके अलावा हीरालाल सेन के साथी श्री भटवडेकर ने सन् 1899 मे लघु चलचित्र बनाने में सफलता प्राप्त की।उसके बाद भारतीय सिनेमा के पितामाह के नाम से दुनिया में मशहूर दादा साहेब फालके ने अपने लंदन प्रवास के दौरान ईसा मसीह के जीवन पर आधारित एक चलचित्र देखा। उस फिल्म को देख कर दादा साहेब फालके के मन में पौराणिक कथाओं पर आधारित चलचित्रों के निर्माण करने की प्रबल इच्छा जागृत हुई।उसके बाद वह स्वदेश आयें, और उन्‍होंने राजा हरिश्चंद्र बनाई। जो कि,  सन् 1913 में प्रदर्शित हुई जिसे भारत की पहली लंबी फिल्म माना जाता है। हालाकि, यह फिल्‍म ध्वनिरहित थी उसके बावजूद इस फिल्‍म ने लोगों का भरपूर मनोरंजन किया और दर्शकों ने उसकी खूब तारीफ की।हालांकि कुछ का यह भी मानना है कि राजा हरिशचन्‍द्र से पहले दादा साहेब तोरणे द्वारा निर्देशित माराठी भाषा की फिल्म ‘श्री पुंडलिक ‘बनाई थी जो कि सन 1912 में प्रदर्शित हुई। यह एक मूक फिल्म थी। उसके बाद 1913 में दादा साहेब फाल्के की राजा हरीश चन्द्र आयी थी ये दोनों मूक फिल्मे थी। लेकिन संवाद के अनुसार फिल्‍म 'राजा हरीशचन्‍द्र' को ही भारत की पहली फिल्‍म माना जाता है। फिर तो चलचित्र निर्माण ने भारत के एक उद्योग का रूप धारण कर लिया और तीव्रता पूर्वक उसका विकास होने लगा। वहीं, सन 1930 तक भारतीय सिनेमा में मूक फिल्‍में ही बना करती थी। फिर सन 1930 के बाद भारतीय चलचित्रों में साउण्‍ड का विकास हो गया और उसकी तकनीकि का इस्‍तेमाल होना शुरू हो गया था। बता दें कि, भारतीय सिनेमा के इतिहास में फिल्‍म 'आलमआरा' को पहली बोलती फिल्‍म का दर्जा प्राप्‍त है। जो कि 1931 में प्रदर्शित की गई थी। उसी साल निर्माता-निर्देशक एच .एम् रेड्डी ने 'भक्त प्रहल्लाद', 15 सितम्बर को तेलगु में तथा ‘कालिदास’ तमिल में 31 अक्टूबर को रिलीज की । 1933 में प्रदर्शित फिल्म कर्मा इतनी अधिक लोकप्रिय हुई। कि उस फिल्म की नायिका देविका रानी को लोग फिल्म स्टार के नाम से संबोधित करने लगे और वे भारत की प्रथम महिला फिल्म स्टार बनीं।आपको बता दें कि, जब तक भारतीय सिनेमा में मूक फिल्मों का बोल-बाला था तब तक मुंबई शहर देश में चलचित्र निर्माण का केन्द्र था। लेकिन जबसे बोलती फिल्मों का निर्माण शुरू हो गया तभी से चेन्नई (पूर्व नाम मद्रास) में दक्षिण भारतीय भाषाओं वाली चलचित्रों का निर्माण होने लगा। इस तरह भारत का चलचित्र उद्योग दो भागों में विभक्त हो गया। क्‍योकिं हमारे देश में प्रांत के अनुसार भाषाओं का चलन है।

वहीं, बता दें कि, उन दिनों भारत में प्रभात, बांबे टाकीज और न्यू थियेटर्स प्रमुख स्टुडिओ थे और ये सामाजिक संदेश ओर मनोरंजक फिल्में बना कर दर्शकों का मनोरंजन किया करती थे। भारत के ये तीन स्टुडिओ ही भारतीय सिनेमा के रीड की हड्डी थे यही देश के बड़े बैनर्स कहलाते था। भारतीय सिनेमा के निर्माता और निर्देशक उन दिनों सामाजिक धारणाओं, भारतीय कल्‍चर, धार्मिक तथा पौराणिक, ऐतिहासिक, देशप्रेम को लेकर विरुद्ध आवाज उठाने वाली, सम्बंधित चलचित्रों का निर्माण हुआ करते थे जिन्‍हें बहुत अधिक पसंद भी किया जाता था। इसके अलावा, 30 के दशक को देखा जाय तो बम्बई और कलकाता के स्टूडियो में जो फिल्मे बनती थी उनमे हिंदी ,उर्दू ,बंगला ,और मराठी संस्कृति का गहरा असर था। इस दशक में दादा साहब फाल्के के आलावा दूसरी हस्तियों का भी प्रमुख योगदान रहा है। फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल के अनुसार भले ही फिल्म का जादू भारत में परदे पर में फाल्के का था लेकिन बाबु राव पेंटर ने भारतीय सिनेमा को यथार्थ वादी और प्राकृतिक मोड़ दिया। पेंटर के भव्य सेट्स बहुत चर्चित हुआ करते थे। पी .सी बरुआ निर्देशित देवदास (1935) और बाम्बे टाकिज की अछूत कन्या ने हिंदी सिनेमा में धूम मचा दिया था । अगर भारतीय सिनेमा का 40 के दशक को देखा जाये तो, उस समय में मसाला फिल्मो का बोल बाला ज्‍यादा रहा था। इस समय के फिल्मो में एक्शन, रोमांस, नाच, गाना सब कुछ हुआ करता था ।  मसाला फिल्मे दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय थी .एस .एस वासु की चंद्रलेखा (1940) जबरदस्त हिट साबित हुई। वहीं, बाम्बे टाकिज की फिल्‍म 'किस्मत' हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर साबित हुई । इसमें अभिनेता अशोक कुमार के एंटी हीरो वाले छवि को लोगों ने खूब पसंद किया गया था। इस फिल्म में आठ गाने थे। कलकत्ता में यह फिल्म लगातार आठ सालों तक देखी गई थी। भारतीय सिनेमा का 50 का दशक संगीत का स्वर्णिम युग था। फिल्‍म आवारा 420, कागज के फूल, मधुमती, सुजाता में गानों को पेश करने में निर्देशकों ने तकनीकी दक्षता और कल्पना से काम लिया गया था। राज कपूर, विमल रॉय, महबूब खान और नितिन बोस जैसे सरीके निर्देशकों ने इस दशक में बेहतरीन फिल्मे बनाकर दर्शकों का खूब मनोरंजन किया था। ये अलग बात है की सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक ने इनसे ज्यादा सफलता प्राप्त की। वही , 1946 में चेतन आनद ने नीचा नगर में कामगारों और मालिको के संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। साथ ही अंतरार्ष्ट्रीय स्‍तर पर कान फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म को पुरस्कार भी मिला। वहीं, जब भारतीय सिनेमा ने 60 के दशक में दस्‍तक दी तो, तो सिनेमाजगत में रंगीन फिल्मो की धाक जमने लगी। तो बॉलीवुड अभिनेता शम्मी कपूर का नया अवतार दर्शकों को दिखा। राज कपूर की ‘जिस देश में गंगा बहती है’(1960), गुरु दत्त की साहब ,बीबी और गुलाम (1962) सुपर हिट साबित हुई। कपूर्स द्वारा बनाई गई फिल्‍मे लोगों को आज भी बेहद पंसद किया जाता है। इन फिल्मो को आज भी देखा जाता है। इसके अलावा, अगर भारतीय सिनेमा को प्रतिष्ठा और गरिमा दिलाने की बात की जाये। तो दिलीप कुमार हिंदी सिनेमा के पहले सुपर स्टार माने जाते हैं। लेकिन वहीं, बाक्‍स-ऑफिस में जब पैसा बरसने लगता है तो स्‍टार्स की डिमांड बढ़ जाती है और वह महंगे हो जाते हैं। जिस वजह से सिल्‍वरस्‍क्रीन पर आई ‘आराधना’ जैसे फिल्मो की सफलता के बाद राजेश खन्ना पहले सुपर स्टार के रूप में जाने जाने लगे। उसके बाद 1973 में प्रकाश मेहरा की जंजीर सफल हुई। इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन की जिन्दगी बदल दी। अमिताभ बच्‍चन की  फिल्‍में दीवार ,शोले ,अमर अकबर एंथनी ,त्रिशूल के हिट हो जाने के बाद हिंदी व्यवसायिक सिनेमा के रीड की हड्डी अमिताभ बच्चन को मानने लगे थे। इस समय लग रहा था कि, मारधाड़ और हिंसा से भरी फिल्मे ही बॉक्स ऑफिस पर सफल साबित होंगी। लेकिन 1975 में रिलीज हुई फिल्‍म 'जय संतोषी माँ' ने सब को गलत साबित कर दिया । यह फिल्म जबर्दस्त हिट हुई ।उसके बाद, फिल्‍मकार श्याम बेनेगल ने फिल्‍म 'अंकुर' बना कर हिंदी फिल्मो में कॉमेडी की एक नयी परंपरा की शुरुआत की। फिल्‍म 'शोले' के बाद हिंदी सिनेमा में हिंसा को ही प्राथमिकता मिली थी, जिस कारण इस अमिताभ युग में धर्मेन्द्र, जितेन्द्र, संजीव कुमार, मनोज कुमार शान्‍त रह गये। उनकी फिल्‍में कब आती थी कब जाती थी। दर्शकों को नही पता चलता था। फिर, भारतीय सिनेमा का 80 और 90 का दौर जो कि, प्यार और रोमांस के नाम रहा। कमल हसन की एक दूजे के लिए (1981), मैंने प्यार किया (1989), कयामत से कयामत तक(1988) , चांदनी(1989) ,दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995), कुछ कुछ होता है (1998) जैसी फिल्मो ने हिंदी फिल्मो में प्यार और रोमांस को लोकप्रिय बना दिया और शाहरुख़ खान बॉलीवुड के बादशाह बन गये। जिसके बाद 90 के दशक के अंत तक लोगों ने सामानांतर सिनेमा का स्वाद भी चखा। राम गोपाल वर्मा की रंगीला, सत्या, बॉक्स ऑफिस में हिट हो गयी।  फिर तो मधुर भंडारकर की चांदनी बार (2001) ट्रेफिक सिग्नल (2008),राम गोपाल वर्मा की कम्पनी (2002),ब्लैक फ्राइडे (2004) ,प्रकाश झा की गंगाजल ,राजनीति ,चक्रव्यूह आदि फिल्मों ने सफलता के झंडे गाड़ दिए थे। उसके बाद कॉमेडी फिल्मो का ज्यादा बोल बाला रहा, नए-नए निर्देशकों को मौका मिला हेरा फेरी, फिर हेरा फेरी, वेलकम, मुन्ना भाई m b b s,जैसी फिल्मों ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।साल 2005 में प्रदर्शित परिणीता से डर्टी गर्ल विद्या बालन ने बॉलीवुड में शानदार आगाज किया। 2006 में प्रदर्शित फिल्म 'काबुल एक्सप्रेस' से सलमान को टाइगर बनाने वाले कबीर खान, फरहा खान के पति शिरीश कुंदर ने जानेमन, दिवाकर बनर्जी ने खोसला का घोंसला से निर्देशन के क्षेत्र में आगाज किया। अभिषेक बच्चन की धूम 2 इस वर्ष सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म बनी। इसी वर्ष कमल हसन की तमिल फिल्म भेटाईयाडू भिलाईयाडू उन फिल्मों में शामिल हुई जिसमें 35 एमएम सुपरतकनीक का पहली बार इस्तेमाल किया गया। साल 2007 में प्रदर्शित फिल्म ओम शांति ओम,  सांवरिया,जॉनी गद्दार,आजा नच ले, चकदे इंडिया, चीनी कम, हे बेबी,  जैसी फिल्‍में बनी थी, जिनको दर्शकों काफी पंसद किया था। वही, शाहरूख की ओम शांति ओम इस वर्ष की सबसे अधिक कामयाब फिल्म थी।साल 2008 में फिल्म गजनी, जाने तू या जाने ना, रब दे बना दी जोड़ी, रॉकआन, वर्ष 2009 में प्रदर्शित फिल्म अलादीन, लवस्टोरी 2050 ,देव डी, लक,लक बाई चांस, वांटेड, आमिर की थ्री इडियट वर्ष 2009 की और भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे अधिक कामयाब फिल्म थी। इसी वर्ष नीतू सिंह ने लव आज कल से 26 वर्षों के बाद अपनी वापसी की। भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय इसी वर्ष उस समय 23 फरवरी को जुड़ गया जब ए आर रहमान को 81वें आस्कर पुरस्कार समारोह में स्लमडॉग मिलिनेयर के लिए दो, वहीं शब्दों के बाजीगर गुलजार को उनके गीत जय हो के लिए सम्मानित किया गया।वर्ष 2010 में जरीन ख़ान ने फिल्‍म वीर से, सोनाक्षी सिन्हा ने दबंग से, रणवीर सिंह ने बैंड बाजा बारात से, अली जाफर ने तेरे बिन लादेन से, शक्ति कपूर की पुत्री श्रद्धा कपूर ने तीन पत्ती से बॉलीवुड में अपने करियर की शुरुआत की थी।  इसके अलावा वर्ष 2010 में ही दक्षिण भारतीय सिनेमा के महानायक रजनीकांत और ऐश्वर्या राय की फिल्म रोबोट ने 255 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर नया इतिहास रच दिया था। वर्ष 2011 में प्रदर्शित फिल्म सिंघम, रॉकस्टार, लेडिज वर्सेज रिकी बहल, अच्‍छी फिल्‍में थी। वर्ष 2012 में प्रदर्शित फिल्म जिस्म 2 थी जिसमें पोर्न स्‍टार सनी लियोनी ने बॉलीवुड में इन्‍ट्री की थी। इसके अलावा अन्‍य फिल्‍में इश्कजादे, बर्फी, विक्की डोनर, स्टूडेंट ऑफ द इयर, दबंग 2,  और अग्निपथ फिल्‍में बनी थी। श्रीदेवी ने लगभग दस वर्षों के बाद इंग्लिश विंग्लिश से अपनी वापसी की। सलमान की एक था टाइगर इस वर्ष की और भारतीय सिनेमा के इतिहास में दूसरी सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म है। वर्ष 2013 की शुरुआत में टेनिस चैंपियन लीयेंडर पेस ने राजधानी एक्सप्रेस से अपने अभिनय जीवन का शुरुआत की। रेस 2 इस वर्ष बॉलीवुड में अबतक सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म है।

बतातें चलें कि, जब भारतीय सिनेमा नें अपने 100 साल पूरे किये थे तो फिल्‍म जगत ने फिल्‍म 'बाम्‍बे टॉकिज' बनाई थी जिसमें पूरे बॉलीवुड को दर्शाया गया था। 21वीं सदी में भारतीय सिनेमा में सभी प्रकार की फिल्‍में बनने लगी हैं जरूरी नही कि, सारी फिल्‍में एक जैसी हो। वर्तमान समय में भारतीय फिल्‍म जगत में बायोपिक,मसाला,कॉमेडी,मोटीवेशनल,एक्‍शन फिल्‍मों का बोलबाला है। अभी बहुत सी ऐसी फिल्‍में बनकर तैयार है जो कि, बायोपिक, कॉमेडी, एक्‍शन, ऐतिहासिक प्रष्‍ठभूमि पर आधारित हैं। वैसे जिस प्रकार से ग्‍लोबलाइेजेशन का असर भारतीय सिनेमा पर पड़ रहा है। उससे भारतीय फिल्‍म जगत का स्‍तर भी काफी उठ रहा है। बॉलीवुड की फिल्‍मों के साथ हॉलीवुड की फिल्‍मों को भी भारतीय दर्शक एक अच्‍छा बाज़ार समझ रहे हैं। जिसकी वजह से भारत में भी हॉलीवुड की फिल्‍में रिलीज़ हो रही हैं साथ ही अच्‍छा बिजनेस भी कर रही हैं। इसके अलावा भारतीय फिल्‍म जगत के कलाकार भी विदेशों में जाकर अपनी कलाकारी का डंका बजा रहे हैं, इनमें अमिताभ बच्‍चन, शाहरूख ख़ान, सलमान ख़ान, आमिर ख़ान, प्रियंका चोपड़ा, ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन, दीपिका पादुकोण जैसे कलाकार है जो विदेशों में अपना हुनर दिखा चुके हैं। हॉलीवुड के कलाकार भी भारतीय फिल्‍मों में उपस्थिति दर्ज कर चुके हैं। इससे तो यही, लग रहा है कि भारतीय सिनेमा जिस तरह से तरक्‍की कर रहे है उससे समय दूर नही कि, वह हॉलीवुड के साथ कदम से कदम मिलाने से चलने वाला है।  

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