संजीव कुमार के जीवन की 10 बातें जो कर देंगी हैरान!!

2 years ago

मुंबई : हिंदी सिनेमा जगत में बहुत ही कम नाम होते है जो हमेशा के लिए इतिहास के पन्नो पर अमर हो जाते है, ऐसा ही एक अभिनेता 1960 में बॉलीवुड को मिला जिसने अपनी उम्दा अभिनय से लोगो के दिल जीत लिए। एक दौर ऐसा था कि दिलीप कुमार, धर्मेन्द्र और अमिताभ बच्चन ये दुआएं करते थे कि उन्हें कोई शॉट इनके साथ देना न पड़ जाएं। और यह एक्टर कोई और नहीं, संजीव कुमार थे।

आज हम आपको बता रहे हैं संजीव कुमार के जीवन से जुड़ी ऐसी ही 10 बातें जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। आप भी दंग रह जाएंगे ये बाते जानकर।

1. बॉलीवुड में साल 1960 से 1984 तक सक्रिय रहे अभिनेता संजीव कुमार का असली नाम हरीभाई जेठालाल जरीवाला था। वो गुजरात के सूरत में पैदा हुए थे और हीरो बनने के लिए मुंबई चले आए थे।

2. अभिनय का शौक जागने पर संजीव कुमार ने इप्टा के लिए स्टेज पर अभिनय करना शुरू किया इसके बाद उन्होंने इंडियन थियेटर एसोसिएशन, मुंबई से एक थियेटर कलाकार के तौर पर एक्टिंग में करियर शुरू किया।

3. 1960 में हम हिंदुस्तानी संजीव कुमार की पहली फिल्म थी। उन्होंने कई फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किए और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई। 1968 में रिलीज हुई 'राजा और रंक' की सफलता ने संजीव कुमार को एक सुपरस्टार बना दिया।

4. संजीव कुमार उम्रदराज लोगों के रोल करने में माहिर समझा जाता था। उन्होंने कई फिल्में अपनी उम्र से अधिक उम्र वाले व्यक्ति का रोल निभाया और ये सभी किरदार काफी पसंद किए गए।

5. 1972 में गुलजार ने संजीव कुमार की फिल्म 'सुबह-ओ-शाम' देखी। संजीव से वे बेहद प्रभावित हुए। इसके बाद गुलजार और संजीव कुमार ने मिलकर कोशिश (1973), आंधी (1975), मौसम (1975), अंगूर (1980), नमकीन (1982) जैसी बेहतरीन फिल्में दीं। कहा जाता है कि 'विधाता' में संजीव कुमार भारी न पड़ जाए इसलिए दिलीप कुमार उनके साथ शॉट देने से बचते थे। हालांकि शत्रुघ्न सिन्हा, सचिन और अमिताभ बच्चन से संजीव कुमार की बहुत अच्छी दोस्ती थी।

6. संजीव कुमार ने अपने करियर में हर तरह की फिल्में की। वे सिर्फ हीरो ही नहीं बनना चाहते थे, उनका मानना था कि कलाकार किसी भी भूमिका को अपने अभिनय से बेहतरीन बना सकता है और रोल की लंबाई कोई मायने नहीं रखती।

7. ये एक तथ्य है कि संजीव कुमार के परिवार में कोई भी पुरुष 50 वर्ष से ज्यादा नहीं जी पाया। संजीव को भी हमेशा महसूस होता था कि वे ज्यादा नहीं जी पाएंगे। उनके छोटे भाई नकुल की मृत्यु संजीव से पहले ही हो गई। ठीक 6 महीने बाद बड़ा भाई किशोर भी चल बसा। संजीव के परिवार के बारे में कहा जाता था कि बेटे के 10 साल का होने पर पिता की मौत हो जाती है।

संजीव कुमार ने भी 47 वर्ष की आयु में ही 6 नवम्बर 1985 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। उनकी मृत्यु हार्ट अटैक की वजह से हुई थी। संजीव कुमार की मृत्यु के बाद उनकी दस से ज्यादा फिल्में प्रदर्शित हुईं। अधिकांश की शूटिंग बाकी रह गई थी। कहानी में फेरबदल कर इन्हें प्रदर्शित किया गया। 1993 में संजीव कुमार की अंतिम फिल्म 'प्रोफेसर की पड़ोसन' प्रदर्शित हुई।

8. फिल्म 'शोले' ने संजीव कुमार ने जो ठाकुर का रोल निभाया था उसे धर्मेन्द्र करना चाहते थे। निर्देशक रमेश सिप्पी उलझन में पड़ गए। उस समय हेमा मालिनी के धर्मेन्द्र दीवाने थे और संजीव कुमार भी। रमेश सिप्पी ने धर्मेन्द्र से कहा कि तुमको वीरू का रोल निभाते हुए ज्यादा से ज्यादा हेमा के साथ रोमांस करने का मौका मिलेगा। यदि तुम ठाकुर बनोगे तो मैं संजीव कुमार को वीरू का रोल दे दूंगा। ट्रिक काम कर गई और धर्मेन्द्र ने यह जिद छोड़ दी। ठाकुर के रोल के कारण संजीव कुमार को आज तक याद किया जाता है।

9. अपनी जिंदगी को लेकर चिंतित संजीव कुमार शादी करने से बचते रहे। हेमा मालिनी को वे पसंद करते थे, लेकिन बीच में धर्मेन्द्र आ गए। सुलक्षणा पंडित के साथ संजीव की नजदीकियां सुर्खियां बटोरती रहीं, लेकिन सुलक्षणा के साथ शादी करने की हिम्मत संजीव नहीं जुटा पाए। एक बार नूतन ने संजीव कुमार को गाल पर थप्पड़ भी मार दिया था। दरअसल नूतन और संजीव के बीच रोमांस की खबरें फैल रही थी जिससे नूतन के वैवाहिक जीवन में खलबली मच गई थी। नूतन को लगा कि संजीव इस तरह की बातें फैला रहे हैं लिहाजा आमना-सामना होने पर उन्होंने संजीव को थप्पड़ जमा दिया।

10. संजीव कुमार को दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। एक बार दस्तक (1971) के लिए और दूसरी बार कोशिश (1973) के लिए। 14 बार फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए संजीव कुमार नॉमिनेट हुए। दो बार उन्होंने बेस्ट एक्टर (आंधी-1976 और अर्जुन पंडित-1977) का और एक बार बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (शिकार-1969) का अवॉर्ड जीता।

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