Flashback - कादर खान ने बचपन में बहुत गरीबी देखी, पैर में पहनने को चप्पल तक नहीं थे

2 weeks ago

कहते हैं मायानगरी मुंबई सपनों का शहर है और दुनिया भर से लोग यहां अपने खवाब को हकीकत में तब्दील करने आते हैं.. लेकिन ये शख़्स मुंबई किसी सपने को सच करने नहीं आया था बल्कि पैदा होते ही किस्मत उसे काबुल से मुंबई लेकर आई थी हकीकत में जिस इंसान का किरदार किसमत ने इस शहर की सिंहाई से लिखा.. उस इंसान की कलम में इस संघर्ष ने इतनी आग भर दी कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में उसने डायलोग राईटिंग के मायने बदल दिए। 

पठानी कादर खान का जन्म 22 अक्टूबर 1937 को काबुल में हुआ। कादर के पिता अब्दुर रहमान पेशे से मौलवी थे और पैसे के रूप में वो जो कुछ भी जोड़ पाते उनकी पतनी उसी में किसी तरह परिवार चलाती थी।  ने जगह बदलने की सोची। कादर के तीन बड़े भाई भी इसी गरीबी की भेंट चढ़ चुके थे। ऐसे में अपने इस लाल को बचाने के लिए कादर की मां ने मुंबई आने का फैसला किया। 

कादर के पिता अब्दुर रहमान को अपनी पत्नी की ये सलाह पसंद आई  और काबूल से अपना घर बार छोड़कर ये परिवार निकला ऐसी अंजान जगह की तलाश में जहां इन्हें बेहतर ज़िंदगी मिल सके। इस छोटे से कारवां की तलाश फाइनली मुंबई में आकर खत्म हुई। कहते हैं सागर किनारे बसे इस शहर का दिल इतना बड़ा है कि कोई भी इसमें समा सकता है। 

मुंबई आने के बाद कादर के पिता पास की ही एक मस्जिद में मौलवी बन गए। पैसे की आमदनी पहले से भी कम हो गई थी। गरीबी इस कदर थी कि कादर के पैर में चप्पल तक नहीं होते थे। बदकिस्मती ने यहां भी इस परिवार का पीछा नहीं छोड़ा. .और कादर की मां को लगा एक बड़ा झटका। पिता ने मां को तलाक देकर किसी और से शादी कर ली। 

बरसो से गरीबी झेल रही कादर खान की मां के लिए ये तलाक एक सदमे से कम नहीं था। उनका ये दुख माइके वालों से देखा नहीं गया और उन्होनें इकबाल बेगम की दूसरी शादी का फैसला किया। सौतेले पिता का ज़िंदगी में आना ना तो कादर के लिए ना ही उनकी मां के लिए सही साबित हुआ। जिन पर इस परिवार की जिम्मेदारी डाली गई थी वो खुद बोझ बन गए। ये 2 लोग इस परिवार की खाने की जरूरतों को बहुत मुश्किल से पूरा कर पाते थे.. .कादर की मांने तो उनको और उनकी मां को कई दिनों तक तो भूखा ही सोना पड़ता था... फिर भी मां का इरादा बेटे को पढ़ा लिखाकर बड़ा आदमी बनाने का था। 

कादर का एडमिशन एमएच साबू सिद्दिक टेक्लनीकल हाई स्कूल में कराया गयाय़ बहरहाल कादर खान की पढ़ाई शुरु हुई।य़ जब बस्ती के सारे बच्चे खेलने में मशगूल होते कादर अपने घर के कोने में बैठे किताबों की दुनिया में खो जाते थे. एक तरफ बस्ती का गंदा माहौल था तो दूसरी तरफ घर के अंदर भरी थी घुटन। ऐसे में कादर ने खुद को पुरी तरह किताबों में उलझा लिया। 

कादर यूं तो लोगों से कम ही मिलते थे..लेकिन इत्तेफाक से एक दिन उनकी मुलाकात एक थिएटर के मालिक से हुई। इस मुलाकात के बाद उनकी दिलचस्पी स्टेज प्ले में बढ़ी और वो नाटक मंडली से भी जुड गए.. एक्टिंग और राइटिंग की बारिकियों को समझते हुए उन्होनें अपनी पढ़ाई जारी रखी खैर मेहनत रंग लाई.. और कादर अच्छे नंबरों से स्कूल में पास हुए। कॉलेड की पढ़ाई भी उन्होनें एमएच साबू सिद्दिक पोलिटेकनीक से ही जारी रखी..उनकी मैरिट को देखते हुए इसी कॉलेज ने उन्हें टीचर का नौकरी भी ऑफ़र की दी

पोलिटेकनीक में कादर स्टूडेंट्स के पसंदीदा टीचर तो थे ही मुंबई के बाकी कॉलेजेस में भी वो कम पॉपुलर नहीं थे। टीचिंग के साथ साथ वो थियेटर से भी जुड़े रहें... और मुंबई के तकरीबन हर कॉलेज में उनके नाटकों को स्टेज किया जाता था वो अपने प्ले लिखते, डायरेक्ट करते और उसमें एक्टिंग भी करते

इस दमदार राइटिंग का क्रेडिट कुछ तो इनके हालात को, कुछ इनकी बुक रीडिंग को जाता था.. रशियन राइटर मैक्सिम गोर्की की नॉवल - मदर उनके लिए राइटिंग बाइबल बन गया। और उनकी इसी राइटिंग कैपेबिलिटी ने एक दिन उन्हें बॉलीवुड का मशहूर डायलॉग राइटर बना दिया। इसके बाद कादर खान फिल्मों में एक्टिंग करने लगे। मशहूर हो गए। बेटे की इस सफलता से मां इकबाल बेगम भी काफी खुश थीं। अब उनका सपना बेटे के सिर पर सेहरा सजाने का थाय़ सगीना की रिलीज़ के बाद मां ने इस हसरत को पूरा किया... 19 सितम्बर 1974 को कादर की शादी अज़रा खान से हो गई। कादर खान के तीन बेटे हुए।