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अद्भुत हैं लता मंगेशकर- राजीव शुक्ला

Sept. 28, 2018, 3:46 p.m.

राजीव शुक्ला, पूर्व केंद्रीय मंत्री (28 सितंबर): आज से लता मंगेश्कर जी जीवन के 90वें वर्ष में प्रवेश कर रही हैं। कोकिला कंठ, स्वर साम्राज्ञी भारत रत्न लता मंगेशकर के दीर्घायु होने की कामना पूरा देश कर रहा है।अभी भी जब कभी मैं उनको फोन करता हूँ तो वह खुद ही उठाती हैं और लगता है कि किसी किशोरी ने फोन उठाया है। उनकी आवाज में आज भी खनक है। आज भी उनकी वाणी में अद्भुत जादू है। ओ बसंती पवन पागल से लेकर ओ पालन हारे तक का सफर दुख और खुश दोनों से भरा रहा है। इस देश में शायद ही कोई ऐसा गायक हो कि जिसने इतने लम्बे वर्षों तक लगातार गाया हो और उसकी आवाज वैसी की वैसी हो। अभी भी लता जी का गायन न छोड़ने का फैसला है और वह अपनी पसंद के गीत, भजन आदि गाना चाहती हैं। वह पहले की तरह बहुत गाने नहीं गाना चाहती हैं। एक दिन उन्होंने मुझे बताया कि अब वह भक्ति पूर्ण गायन ज्यादा करेंगी। उनके आराध्य देव भगवान कृष्ण हैं।

मैंने उनसे पूछा कि आपको सबसे खराब क्या लगता है उनका कहना था कि जब कोई मेरे सामने बेसुरा गाता है तो मुझे बहुत बुरा लगता है। वे रेडियो या टेलीविजन पर अपने खुद के गाने नहीं सुनतीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कैसा गाना गाया, उससे अच्छा गा सकती थीं। उन्होंने कहा मैंने कई गाने बेमन से गाये। सिर्फ काम चलाने के लिए गा दिया। इनमें मैं क्या करूँ राम मुझे बुड्ढ़ा मिल गया, लागी बदन में ज्वाला, सैंया तूने क्या कर डाला और रजिया सुल्तान के सारे गाने जिसमें ऐ दिले नादान, आरजू क्या है, जुस्तजू क्या है भी शामिल है।

लता जी को दूसरी बात यह बुरी लगती है कोई उनके परिवार वालों के खिलाफ कोई कुछ बोले। वह कहती हैं कि मेरे खिलाफ कोई कुछ भी कह ले, लेकिन मेरी बहनों, भाई या उनके बच्चों के खिलाफ कोई बोलता है तो मुझे सहन नहीं होता। इस मामले में लता जी का अनुकरण हर व्यक्ति को करना चाहिए। अपने परिवार को जिस तरह प्यार करती हैं, शायद ही कोई करता होगा। एक तो वे सारे परिवार को एक साथ मुबंई में रखती हैं और किसी भतीजे या भतीजी के बिना कहीं आती-जाती नहीं हैं। मैंने पूछा लोग कहते हैं कि आप और आशा जी में अनबन रहती हैं? आप पर आरोप है कि आपने उनके आगे बढ़ने में बहुत रोड़े अटकाये। और तो और सई परांजपे ने “सुर” नामक एक फिल्म इसी विषय पर बना डाली। लताजी को बहुत आश्चर्य हुआ, बोलीं आशा आज जो कुछ है वह मेरे बगैर नहीं है। आज भी अगर परिवार के किसी सदस्य को मेरे बेडरूम में आना होता है तो उसे आशा के बेडरूम से होकर आना पड़ेगा। कैसे लोग इस तरह की बातें करते हैं, मेरी समझ में नहीं आता है। मैं अपने भाई और बहनों के खिलाफ सोच भी नहीं सकती हूँ, फिर खिलाफ होना तो बहुत दूर है। उनके पारिवारिक मित्र राजसिंह डूंगरपुर ने मुझे बताया था कि लता जी बिना अपने परिवार के रह नहीं सकती हैं। यदि वह विदेश भी जाती हैं तो भाई-बहनों के बच्चों के टिकट भी प्रथम श्रेणी में करवाती हैं। एक बार कहा कि इन्हें मत बिगाड़ो तो उनके टिकट इकोनामी क्लास में तो करा दिए, लेकिन जहाज के उड़ते ही खुद भी प्रथम श्रेणी से उठकर इकोनामी क्लास में चली आईं और वहां बच्चों के साथ ही नौ घंटे बैठी रहीं।

मैंने लता जी से एक बार सवाल किया था कि आपने शादी क्यों नहीं की, कभी अपना घर बसाने की बात क्यों नहीं सोची। इस तरह के सवाल उनके व्यक्तित्व के आगे कभी कोई नहीं करता, लेकिन वह जरा भी विचलित नहीं हुईं और बोलीं जब मैं तेरह साल की थी तो पिता की मृत्यु हो गयी और परिवार के नौं लोगों का भार मेरे ऊपर आ गया जिसमें हम पांच भाई-बहन, माँ और मेरी विधवा मौसी और उनके दो बच्चे थे। उनका पालन करते-करते जब मैंने होश संभाला तो पता चला कि मेरी शादी करने की उम्र ही गुजर चुकी है। यह बात कभी मेरे ख्याल में ही नहीं आई।

लता जी ने बहुत दुख भरे दिन देखे हैं। एक वक्त था कि खाने के लाले थे। घर में चार-चार दिन तक खाना नहीं बनता था। नौकरानी कहीं से खाना ले आती थी तो उनकी माँ बच्चों को खाने नहीं देती थीं। कहती थीं कि भूख से शरीर मरता है और भीख से आत्मा। लता जी ने तेरह साल की उम्र में मराठी नाट्य और फिल्म कंपनियों में गाकर, अभिनय कर घर का खर्च चलाना शुरू किया। उन्हें तीन रुपये महीने के मिलते थे और एक बार आफिस कैंटीन में उनका खुद का बिल दस रूपये आ गया तो उन्होंने आफिस में खाना बंद कर दिया। मुम्बई आने पर भी उन्होंने बहुत गरीब मोहल्लों के एक कमरे के घर में नौ लोगों के साथ रह कर जीवन यापन किया। वह भरी दोपहरी में मीलों पैदल चलकर स्टूडियो-स्टूडियो काम के लिए चक्कर लगाती थीं। खुद नौशाद ने कहा है कि जब मैंने उनको हिन्दी फिल्म का पहला गाना दिया और उसके लिए साठ रूपये का भुगतान किया तो वह खुशी से झूम उठीं। उनके बोलने में मराठी भाषा का प्रभाव था जिसे दूर करने में नौशाद सहित कई संगीतकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। खासतौर पर उन्हें उर्दू और हिन्दी का उच्चारण सिखाया।

इतनी गरीबी में दिन बिताने के बाद जब करोड़ों रुपये उनके पास आने लगे तब भी उन्होंने अपना स्वभाव नहीं बदला। वह सादगी से रहती हैं। आज वह यदि दो घंटे भी किसी कार्यक्रम में गा दें तो चार करोड़ रुपए तो सिर्फ टेलीविजन कंपनियों से मिल जाते हैं। उन्हें सोने की पायलें पहनने का शौक है। कभी उनसे कहा गया था कि सोना पांव में नहीं पहना जाता पर वे जानबूझकर पहनती हैं।

पंडित नेहरू की बेहद प्रिय लता जी की रुचि कभी राजनीति में नहीं रही। कई बार उन्हें राज्यसभा के प्रस्ताव दिए गए। इंदिरा जी ने एन के पी साल्वे के जरिए कहलवाया, लेकिन वह तैयार नहीं हुईं। 1999 में वह आडवाणी जी के जोर देने पर राजी हुईं और 1999 से 2005 तक सांसद रहीं। वह दिल्ली बहुत कम आती थीं और इसको लेकर उन पर काफी छींटाकश होती रहती थी, लेकिन असलियत यह है कि जब उन्होंने राज्यसभा सदस्य बनना स्वीकार किया था तो पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वह बहुत कम दिल्ली आ जा पाएंगी। वह अक्सर मुझसे कहती थी कि लगता है कि मैं संसद के साथ न्याय नहीं कर रही हूँ इसलिए मुझे इस्तीफा दे देना चाहिए। चूँकि वह राष्ट्रपति द्वारा नामजद थीं इसलिए एक राजनीतिक दल के सदस्य सरीखे उनके दायित्व नहीं बनते हैं। इसके बावजूद संसद न आ पाने का मलाल उन्हें रहता था। उन्होंने सांसद रहते हुए संसद सदस्य को मिलने वाली वाली एक भी सुविधा का फायदा नहीं उठाया था। उन्हें दरअसल महाराष्ट्र से बहुत लगाव है। एक बार बोलीं कि मैं भगवान से एक ही प्रार्थना करती हूँ कि अगर दोबारा जन्म दे तो महाराष्ट्र में ही दे और लड़की मत बनाए, क्योंकि स्त्री होने के बहुत दुख होते हैं और मैं दोबारा उन दुखों को सहन नहीं कर सकती हूँ।

भारत रत्न सम्मान बहुत कम लोगों को मिला है। लता जी सचमुच इस सम्मान की सबसे उपयुक्त पात्र हैं। न केवल कश्मीर से कन्याकुमारी तक, बल्कि विदेशों में उनके प्रशंसक भारी संख्या में हैं। लता जी कहती हैं कि उन्हें जिन्दगी में सबसे ज्यादा खुशी तब हुई जब एलबर्ट हाल, लंदन में उनका पहला कार्यक्रम हुआ और हजारों की भीड़ टिकट खरीदने के लिए टूट पड़ी। इनमें भारतीयों और पाकिस्तानियों के अलावा अन्य देशों के लोग भी थे। व्यवस्था में लगे अंग्रेज इतनी भीड़ देखकर अंचभे में पड़ गए थे। उन्हें क्रिकेट से भी बेहद लगाव  है। जब भारतीय टीम ने विश्व कप जीता था तो बोर्ड के पास खिलाड़ियों को इनाम देने के पैसे नहीं थे। लता जी ने अपनी जेब से एक-एक लाख रुपये हर खिलाड़ी को दिया था और लंदन में अपने फ्लैट में बुलाकर अपने हाथ से गाजर का हलवा बनाकर खिलाया था। शायद इसीलिए जब उन्होंने अपने पिता की याद में बने अस्पताल के सहायतार्थ क्रिकेट मैच रखा तो भारतीय टीम खुशी-खुशी उसमें शामिल हुई। ईश्वर से कामना है कि वे जीवन के सौ बंसत पूरे करें।

(लेखक पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं)