Birthday Spl- नूतन वो हीरोइन थीं जिनके लिए फिल्में लिखी जाती थी

11 months ago

हिंदी सिनेमा में नूतन को एक ऐसी एक्ट्रेस के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने फिल्मों में हीरोइंसको महज शो पीस के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की ट्रेडिशन को बदल दिया। नूतन वो हीरोइन थी जिनके लिए फिल्में लिखी जाती थी। हीरोइन ओरिएंटेड फिल्मों के लिए डायरेक्टर्स प्रोड्यूसर्स सबसे पहले नूतन को ही एप्रोच करते थे ।

सुजाता, बंदिनी, मैं तुलसी तेरे आंगन की, सीमा, सरस्वती चंद्र, और मिलन जैसी कई फिल्मों में अपने जबरदस्त एक्टिंग से नूतन ने यह साबित कर दिया कि हीरोइंस में भी गजब की एक्टिंग होती बै औरवो भी दर्शकों को सिनेमा हॉल तक खींच सकती है

4 जून 1936 को मुंबई में जन्मी नूतन समर्थ को एक्टिंग विरासत में मिली। मां शोभना समर्थ जानी मानी फिल्म एक्ट्रेस थी। घर में फिल्मी माहौल रहने के कारण नूतन अक्सर अपनी मां के साथ शूटिंग देखने जाया करती थी। इस वजह से उनका फिल्मों से लगाव हो गया की और वह भी हीरोइन बनने के ख्वाब देखने लगी।नूतन ने बतौर बाल कलाकार फिल्म नल दमयंती से अपने कैरियर की शुरूआत की। इसके बाद उन्होंने मिस इंडिया कॉन्टेस्ट में हिस्सा लिया और वो 1952 की मिस इंडिया बन गई.लेकिन किसी भी फिल्ममेकर का ध्यान शोभना समर्थ की  हसीन बेटी पर नहीं गया।और फिर मां शोभना समर्थ ने खुद ही अपनी हसीन बेटी को फिल्मों में लॉन्च किया।

साल 1950 में फिल्म हमारी बेटी बतौर एक्ट्रेस नूतन की पहली फिल्म थी इस फिल्म का डायरेक्शन शोभना समर्थ ने किया।फिल्म तो रिलीज हो गई लेकिन नूतन को पहचान नहीं मिलीइसके बाद नूतन ने हमलोग, शीशम, नगीना और शवाब जैसी कुछ फिल्मों में काम किया लेकिन एक के बाद सभी फिल्में फ्लॉप रही।1955 में आई फिल्म सीमा से नूतन ने एक गरीब और गुस्सैल लड़की के रोल को रूपहले पर्दे पर जीया। बलराज साहनी के साथ सीमा हिट रही और नूतन के फिल्मी करियर ने रफ्तार पकड़ लिया। इस बीच नूतन ने देवानंद के साथ पेइंग गेस्ट और तेरे घर के सामने मेंजैसी फिल्मों में हल्के-फुल्के रोल किए और दर्शकों में पॉपुलर हुईं।

 ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के दौर में देवानंद और नूतन की जोड़ी खूब मशहूर हो गई। नूतन अब तक बॉलीवुड में छाने लगी थी...और फिर 1958 में फिल्म सोने की चिडि़या के हिट होने के बाद फिल्म इंडस्ट्री में नूतन के नाम के डंके बजने लगे

लेकिन नूतन के फिल्मी करियर को निखारने वाले विमल रॉय जब उनसे मिले तब जाकर नूतन के करियर को एक नया मोड़ मिला। 

 1959 में उन्होंने नूतन के साथ बनाई सुजाता। सुजाता में नूतन ने एक अछूत लड़की का अवार्ड विनिंग रोल निभाया। 

1962 में नूतन बंदिनी बनी। इस फिल्म में नूतन के साथ थे धर्मेन्द्र और अशोक कुमार। बंदिनी ने एक बार फिर नूतन ने जबरदस्त परफ़ॉरमेंस दिया। इस फिल्म में नूतन को देखकर ऐसा लगा मानों उनकी आंखे ही नहीं उनके हाथ अंगुलिया भी एक्टिंग कर रही हो।एक के बाद एक मुश्किल रोल निभाकर नूतन फिल्म इंडस्ट्री में नंबर वन की कुर्सी की हकदार हो गई। विमल रॉय की फिल्मों ने नूतन को वो नाम दिया जिसके लिए वो आज भी याद की जाती हैं। सुजाता एवं बंदिनी तो नूतन के उपनाम बन गए।

1968 में आई फिल्म सरस्वती चंद्र भी सुपर हिट रही और नूतनअपने दौर की सभी हीरोइंस के कहीं आगे निकल गई। इस फिल्म के गाने सुपरहिट रहे। नूतन जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी उनपर आरोप लगाने वाले भी बढ़ने लगे। नूतन पर ये आरोप लगा कि वो एक ही तरह के रोल्स कर सकती है। लेकिन दिल्ली का ठग, छलिया और सूरत जैसी फिल्मों में कॉमिक रोलकर नूतन ने अपने विरोधियो का मुंह एक बार फिर से बंद कर दिया।नूतन ने साऊथ का भी रूख किया। 1965 में नूतन ने एक तेलगू फिल्म में काम किया.और इसके बाद वो साऊथ के फिल्म मेकर्स की फिल्मों में भी दिखने लगी। इनमें गौरी, मेहरबान, खानदान, मिलन और भाई बहन जैसी सुपरहिट फिल्में शामिल है।1973 में फिल्म सौदागार में नूतन ने एक बार फिर से ना भूलने वाला रोल निभाया। फिल्म सौदागर में नूतन अमिताभ बच्चन के साथ दिखी इसके बाद 1978में आई नूतन की फिल्म मैं तुलसी तेरे आंगन की। इस फिल्म में नूतन ग्रे शेड्स वाले कैरेक्टर में थी। 80 के दशक में नूतन ने कैरेक्टर रोल्स निभाने शुरू कर दिए और कई फिल्मों में मां के किरदार को साकार किया। मेरी जंग, नाम और कर्मा जैसी फिल्मों में नूतन गजब की एक्टिंग कर फिल्म के हीरोज पर भी भारी पड़ी। करीब 40 सालों तक नूतन ने हिंदी सिनेमा को अपने हुस्न और अदायगी से चमकाया। 70 फिल्मों में काम करने वाली नूतन बॉलीवुड में बेस्ट एक्ट्रेसेज में से एक है। 

21 फरवरी 1991 में नूतन अपने चाहने वालों को अलविदा कह गई और अपने आखिरी दिनों तक फिल्मों में काम करती रही। उनकी मौत के बाद इंसानियत और नसीबवाला जैसी फिल्में रिलीज हुई।