FILM REVIEW...कुछ ऐसी है 'द लेजेंड ऑफ माइकल मिश्रा' की कहानी....

2 years ago

मुंबई : फिल्म 'द लेजेंड ऑफ माइकल मिश्रा' में बचपन में परिस्थितियों के चलते अपराध का दामन थाम चुके युवक के डाकू से संत बनने की कहानी बयां की गई है। संत बनने की वजह एक लड़की से बेइंतहा मुहब्बत है। कभी न कभी प्यार सबको होता है। कभी कम उम्र में तो कभी बढ़ी उम्र में। निर्देशक मनीष झा की ये फिल्म ऐसी कॉमिक कहानी कहती है, जिसमें सामने एक पहलू दिख रहा होता है और अंत होते-होते दूसरा पहलू प्रकट होकर चौंका देता है।

इस फिल्म में फिर साथ नजर आने वाले हैं अरशद वारसी और बोमन इरानी..

फिल्म मुख्य रूप से उनके लिए है जो सिनेमा में ऐसा अंदाज-ए-बयां देखना चाहते हैं जो रूटीन फिल्मों से हट कर हो। जिसमें कहानी भले ही बॉलीवुड के अंदाज की हो लेकिन उसे कहने का ढंग जरा अलग हो। मनीष की फिल्म ऐसी ही है।

फिल्म में पटना के जिस माइकल मिश्रा (अरशद वारसी) की कहानी आप देख रहे होते हैं, वह असल में सुनाई जा रही होती है। सुनाने का काम बोमन ईरानी ने किया है। नन्हा माइकल दर्जी है और इस काम में उसे महारत हासिल है। मगर एक बार उसके हाथों धोखे से पटना का गैंगस्टर मारा जाता है और लोग उसे सिर-आंखों पर बैठा लेते हैं।

‘The legend of michael mishra’ में अरशद वारसी और बोमन इरानी करने वाले है कुछ ऐसा…

यह घटना माइकल को टेलर से किडनैपर बना देती है। मगर दूसरा हादसा इससे बड़ा होता है जब पुलिस की पकड़ से भागते हुए एक लड़की माइकल को दिखती है और वह उसे दिल दे बैठता है। दोनों के बीच प्यार हो जाता है, पर वर्षा की चाची को माइकल पसंद नहीं है। वर्षा, माइकल से कहती है कि वो बुरे काम छोड़ दे। माइकल उसकी बात मानकर खुद को पुलिस के हावले कर देता है।

उस पर मुकदमा भी चलता है और उसको, उसके सारे बुरे कामों की सजा मिलती है 500 साल। उसको काला पानी भेज दिया जाता है। वर्षा उससे दूर हो जाती है। उसको तो पता भी नहीं है कि माइकल केवल उसके लिए जेल गया है। शरुआती घटनाक्रम से पता चलता है कि फिल्म की कहानी काफी उलझती हुई है। कॉमेडी भी रुक रुक कर एंटरटेन करती है। अरशद वारसी को देख ऐसा लगता है कि वो जबरदस्ती एक्टिंग कर रहे हैं।

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