शहीद की पत्नी ने आजतक उसकी जैकेट नहीं धोई, पति याद आती है तो उसे पहन लेती है !

4 weeks ago

विक्की कौशल की फिल्म उरी - द सर्जिकल स्ट्राइक रिलीज के दस दिन बाद भी ताबड़तोड़ कमाई कर रही है। रिलीज के दस दिन बाद भी वीकएंड पर सिनेमा घर भरे हुए नजर आए। फिल्म तेजी से 100 करोड़ की तरफ बढ़ रही है। फिल्म उरी हमले के बाद भारत के जांबाज सैनिको के लाइन ऑफ कंट्रोल पर में किए गए सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में है। साथ ही फिल्म में उरी हमले में शहीद हुए मेजर अक्षय गिरीश की कहानी भी कुछ हद तक दिखाई गई है। मेजर अक्षय गिरीश से मिलता जुलता रोल मोहित रैना ने किया है। उनकी पत्नी के रोल में मानसी पारेख हैं। फिल्म में एक सीन है जब पति के शहादत के बाद मानसी कहती हैं कि वो अपने पति के कपड़े नहीं धोना चाहती। उन कपड़ों से उसके पति की खुश्बू आती है। ऐसा ही दर्द मेजर अक्षय की वाइफ संगीता ने फेसबुक पर शेयर किया था। मेजर अक्षय गिरीश उरी हमले में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। फिल्म में ये सीन काफी इमोशनल है। मेजर अक्षय गिरीश की वाइफ ने जो दर्द बयां किया था वो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था। 

''मैंने आज तक अपने पति की वर्दी मैंने धोयी नहीं है। जब भी उसकी बहुत याद आती है, तो उनकी जैकेट पहन लेती हूं। उसमें उसे महसूस कर पाती हूं। शुरू में अपनी बेटी नैना को समझाना मुश्किल था कि उसके पापा को क्या हो गया, वह अब इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन कुछ दिनों के बाद बड़ी हिम्मत करके मैंने अपनी बेटी से कह दिया कि अब उसके पापा आसमान में एक तारा बन गए हैं. आज हमारी जमा की चीज़ों से ही मैंने एक दुनिया बना ली है, जहां वो जीता है, मेरी यादों में, हमारी तस्वीरों में। आंखों में आंसू हों, फिर भी मुस्कुराती हूं. जानती हूं कि वो होता तो मुझे मुस्कुराते हुए ही देखना चाहता।

"2009 में उसने मुझे प्रपोज़ किया था। 2011 में हमारी शादी हुई, मैं पुणे आ गयी। दो साल बाद नैना का जन्म हुआ। उसे लम्बे समय तक काम के सिलसिले में बाहर रहना पड़ता था। हमारी बच्ची छोटी थी, इसलिए हमारे परिवारों ने कहा कि मैं बेंगलुरु आ जाऊं। मैंने फिर भी वहीं रहना चुना जहां अक्षय था. मैं हमारी उस छोटी सी दुनिया से दूर नहीं जाना चाहती थी, जो हमने मिल कर बनायी थी।

उसके साथ ज़िंदगी हंसती-खेलती थी। उससे मिलने नैना को लेकर 2011 फ़ीट पर जाना, स्काईडाइविंग करना, हमने सबकुछ किया। 

2016 में उसे नगरोटा भेजा गया. हमें अभी वहां घर नहीं मिला था, इसलिए हम ऑफ़िसर्स मेस में रह रहे थे. 29 नवम्बर की सुबह 5:30 बजे अचानक गोलियों की आवाज़ से हमारी आंख खुली। हमें लगा कि ट्रेनिंग चल रही है, तभी ग्रेनेड की आवाज़ भी आने लगी। 5:45 पर अक्षय के एक जूनियर ने आकर बताया कि आतंकियों ने तोपखाने की रेजिमेंट को बंधक बना लिया है. उसके मुझसे आखरी शब्द थे "तुम्हें इसके बारे में लिखना चाहिए"। 

सभी बच्चों और महिलाओं को एक कमरे में रखा गया था। संतरियों को कमरे के बाहर तैनात किया गया था, हमें लगातार फ़ायरिंग की आवाज़ आ रही थी। मैंने अपनी सास और ननद से इस बीच बात की. 8:09 पर उसने ग्रुप चैट में मेसेज किया कि वो लड़ाई में है। 

8:30 बजे सबको सुरक्षित जगह ले जाया गया। अभी भी हम सब पजामों और चप्पलों में ही थे. दिन चढ़ता रहा, लेकिन कोई ख़बर नहीं आ रही थी। मेरा दिल बैठा जा रहा था। मुझसे रहा नहीं गया, मैंने 11:30 बजे उसे फ़ोन किया। किसी और ने फ़ोन उठा कर कहा कि मेजर अक्षय को दूसरी लोकेशन पर भेजा गया है।

लगभग शाम 6:15 बजे कुछ अफ़सर मुझसे मिलने आये और कहा, "मैम हमने अक्षय को खो दिया है, सुबह 8:30 बजे वो शहीद हो गए." मेरी दुनिया वहीं थम गयी। जाने क्या-क्या ख़याल मेरे मन में आते रहे. कभी लगता कि काश मैंने उसे कोई मेसेज कर दिया होता, काश जाने से पहले एक बार उसे गले लगा लिया होता, काश एक आखिरी बार उससे कहा होता कि मैं उससे प्यार करती हूं.

चीज़ें वैसी नहीं होतीं, जैसा हमने सोचा होता है। मैं बच्चों की तरह बिलखती रही, जैसे मेरी आत्मा के किसी ने टुकड़े कर दिए हों । दो और सिपाही भी उस दिन शहीद हो गए थे। मुझे उसकी वर्दी और कपड़े मिले.। एक ट्रक में वो सब था जो इन सालों में हमने जोड़ा था। लाख नाकाम कोशिशें कीं अपने आंसुओं को रोकने की। 

कहते हैं न, अगर आपने अपनी आत्मा को चीर देने का दर्द नहीं सहा, तो क्या प्यार किया. दर्द तो बहुत होता है पर हां, मैं उससे हमेशा इसी तरह प्यार करूंगी।" आप सब जानते तो है कि शहीदों के परिवारों को ये दिन देखना ही पड़ता है। मैं आज अपनी बेटी के साथ खुश हूं, उसे अच्छी तालीम दे रही हूं, ताकि उसे जीवन में किसी चीज कि कमी महसूस न होने दूँ। 

साभार - फेसबुक