एक दौर था जब हिंदी सिनेमा की 'प्राण' हुआ करता था वो सितारा

1 years ago

12 जुलाई 2013 वो तारीख है जब बॉलीवुड के प्राण दुनिया छोड़कर चले गए। प्राण को गुजरे चार साल बीत चुके हैं लेकिन फैन्स के दिलों आज भी वो दमदार आवाज, वो बुलंद शख्सियत की यादें ताजा हैं। बंटवारे के बाद प्राण जब मुंबई आए...तो मुश्किलों ने उन्हे चारो ओर से घेर लिया. था । पांच महीने तक वो बेरोजगार रहें...इस दौरान उन्हे अपनी पत्नी के गहने तक बेचने पड़े...। लेकिन बॉम्बे टॉकीज़ की ज़िद्दी के साथ ही उन्हे तीन और फ़िल्में मिलीं..। प्रभात की 'आपाधापी', एसएम यूसुफ की 'गृहस्थी' और वली मोहम्मद की 'पुतली'। 'जिद्दी' फिल्म के लिए उनको पांच सौ रुपए फ़ीस मिले...इसके बाद 'अपराधी' के लिए उन्होंने हीरो से सौ रुपए फीस ली...।

प्राण ने वैजयंतीमाला, ओमप्रकाश के साथ बहार फ़िल्म साइन की...। प्राण चाहते थे कि इस फ़िल्म के प्रीमियर पर वो अपनी पत्नी के साथ कार से जाएं...इसीलिए उन्होने कार खरीद भी ली, लेकिन प्रीमियर के दो दिन पहले कार का एक्सीडेंट हो गया...। तो प्राण बहुत नाराज़ हुए...। प्रीमियर पर तो कार से नहीं जा सके...लेकिन उन्होने इस फ़िल्म की फीस से दूसरी कार खरीद ली..।

प्राण चाहते तो वो हीरो बन सकते थे...लेकिन वो हीरो बनना ही नहीं चाहते..। उन्हे विलेन कहलाना पसंद था...बच्चे प्राण से ख़ौफ़ खाने लगे...थियेटर में जब प्राण का सीन आता, तो छोटे बच्चे मां के आंचल में अपना मुंह छिपा लेते और कहते कि मां वो बुरा आदमी जाएगा...तो बताना...मैं आंखें खोलुंगा..।और प्राण को ये पसंद था...वो कहते कि जिस दिन ये मुझसे डरना छोड़ देंगे, मुझे अपने रोल्स पर फ़िर से सोचना होगा..।प्राण सिल्वर स्क्रीन पर ख़तरनाक से ख़तरनाक होते चले गएं...। आलम ये हो गया कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना छोड़ दिया..।

राजकपूर, दिलीप कुमार, देवानंद, राजेन्द्र कुमार, राजेश ख़न्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, शम्मी कपूर बस नाम लेते जाइए...हीरो कोई भी हो...लेकिन विलेन के किरदार के लिए सबको प्राण का ही साथ चाहिए था...। लोग ये जानना चाहते थे कि सिनेमाई स्क्रीन का ये सबसे बड़ा ख़लनायक असल ज़िंदगी में कैसा है..एक रिपोर्टर ने प्राण से पूछा कि हर एक्टर के बारे में कोई ना कोई गॉसिप ज़रूर होती है...आपके बारे में ऐसा क्यों नहीं है...तो प्राण ने जवाब दिया कि वो एक अच्छे पति हैं, एक अच्छे पिता है...और शायद वो घर पर भी एक अच्छे अभिनेता हैं, इसलिए उनके बारे में कोई गॉसिप नहीं होती..।

सिल्वर स्क्रीन का ये ख़लनायक, असल ज़िंदगी में एक नायक था...पहली बार जब मनोज कुमार अपनी फ़िल्म उपकार के लिए प्राण के पास मलंग चाचा का किरदार लेकर पहुंचे, तो प्राण ने उनसे कहा कि कहीं वो मज़ाक तो नहीं कर रहे हैं...।लेकिन मनोज कुमार ने प्राण की पहचान बदलने का बीड़ा उठा लिया था...। मलंग चाचा का ये किरदार प्राण के लिए एक टर्निंग प्वाइंट साबित हो गया.प्राण ने इस किरदार को इतनी शिद्दत से तराशा...कि उन्हे इसके लिए पहला फ़िल्म फेयर अवॉर्ड मिला..। उस दौर के बारे में प्राण ने अपने एक इंटरव्यू के दौरान कहा -'उपकार' से पहले सड़क पर मुझे देखकर लोग मुझे 'अरे बदमाश', 'ओ लफंगे', 'ओ गुंडे ' कहा करते थे। प्राण ने अपनी विलेनियस इमेज बनाई और फ़िर खुद ही उसे तोड़ दिया...। और वो भी ऐसे दौर में जब हीरो और विलेन्स की इमेज ही उसका सब कुछ होता था..।

प्राण के सबसे ख़तरनाक विलेन बनने की कहानी आसान नहीं रहीं...दिल्ली के बल्लीमांरा में जन्मे प्राण ने मैट्रिक तो पास कर ली...लेकिन किताबों पर लिखे काले अक्षरों से प्राणी की यारी कभी नहीं हो सकी...। नौजवान प्राण को तस्वीरें खींचने का बहुत शौक था....उन्होने पढ़ाई छोड़ी, तो दिल्ली के एक फोटोस्टूडियों में आकर नौकरी कर ली...। फोटो स्टूडियों के मालिक ने अपने कारोबार को बढ़ाने का फैसला किया, तो प्राण को स्टूडियों के शिमला ब्रांच की ज़िम्मेदारी देकर भेज दिया..एक साल के बाद प्राण अपने फोटो स्टूडियों के काम के चलते ही लाहौर आएं...।

प्राण को उस दौरान सिगरेट पीने को बहुत शौक था....आलम ये था कि लाहौर के पान की दुकानों पर प्राण पहुंचते, तो दुकान का मालिक बिना कहे ही उनका ब्रैंड उनके हाथ में रख देता....। सिगरेट के इसी शौक के चलते प्राण का सिनेमाई दुनिया से पहली बार राब्ता हुआ....। एक दिन प्राण सिगरेट पीने, पान की दुकान पर गए...तो उन्होने दखा कि उन्हे एक शख़्स बहुत गहरी निगाहों से घूर रहा है...। प्राण बात को समझ नहीं पाए...। ये शख़्स कोई और नहीं, उस वक्त के मशहूर स्क्रिप्ट राइटर – वली मोहम्मद थे...और प्राण की शख़्सियत में उन्हे अपनी नई फ़िल्म का हीरो मिल गया था...। फ़िल्म थी यमला जट....। वली मोहम्मद ने कागज़ के एक टुकड़े पर अपना पता लिखकर प्राण को उस पते पर मिलने के लिए कहा...। प्राण ने वली मोहम्मद की बात नज़रअंदाज़ की....। कुछ दिनों के बाद प्राण उनसे फ़िर टकराएं...तो वली साहब ने उन्हे मुलाकात की बात याद दिलाई....। चिड़चिड़ाकर प्राण साहब ने उनसे पूछ लिया कि आख़िर वो चाहते क्या हैं...। वली साहब ने अपना ईरादा प्राण को बताया, तो वो प्राण को ये बात मज़ाक लगी....। वली मोहम्मद ने बड़ी मुश्किल से प्राण को इस फ़िल्म के लिए राज़ी किया...।

यमला जट हिट साबित हुई....। फ़िल्म के हिट होते ही प्राण, वली मोहम्मद के और करीब आ गए...उस वक्त प्राण की तनख़्वाह 50 रुपए महीने थे...फ़िल्मों में काम करते हुए भी प्राण ने फोटोग्राफी से नाता नहीं तोड़ा...। प्रोड्यूसर ने उन्हे इस बात की सहूलियत दे रखी थी कि उन्हे पूरे वक्त सेटे पर मौजूद रहने की ज़रूरत नहीं है, जब भी उनका शॉट होगा...उन्हे बुला लिया जाएगा। यमला जट के बाद प्राण ने डायरेक्टर शौकत हुसैन की फ़िल्म ख़ानदान साइन की...। इस फ़िल्म में प्राण, मशहूर सिंगर – नूरजहां के हीरो बने....फ़िल्म हिट साबित हुई...लेकिन प्राण ने अपने दिल की बात भी ज़ाहिर कर दी, वो ये कि उन्हे हीरोइन के साथ पेड़ों के इर्द-गिर्द चक्कर लगाना पसंद नहीं।

प्राण की ये तमाम फ़िल्में लाहौर में ही शूट होती रहीं....फ़िर आया बंटवारे का वक्त....। लाहौर की सूरत बदलने लगी...प्राण मुंबई चले आए...लेकिन यहां उन्हे शुरुआत में काम नहीं मिला...मजबूरी में प्राण यहां एक रेस्टूरेंट में काम करने लगे...पूरे 6 महीने तक उन्होने रेस्टोरेंट में काम किया...उस दौरान उन्हे अपने लाहौर के ज़माने के दोस्त, और बेहतरीन राइटर - सहादत हसन मंटो से मिले...जो उन्हे बॉम्बे टॉकीज़ में ले गए...यहां प्राण को देवानंद की ज़िद्दी मिली..।ये फ़िल्म बेहद कामयाब रही और फ़िल्म के हिट होते-होते ही प्राण को तीन और फ़िल्में मिल चुकी थीं...।

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