हार्ट अटैक को बदहजमी समझ बैठे थे रफी...मौत से कुुछ घंटे पहले की थी रिकॉर्डिंग

1 years ago

काश रफी साहब ने सुरों की तरह जिंदगी को भी गंभीरता से लिया होता । 31 जुलाई 1980 की सुबह साढ़े नौ बजे रफी साहब को दिल में दर्द महसूस हुआ, उन्हें लगा ये तकलीफ बदहजमी या गैस की वजह से उठी है। रफी साहब को उस दर्द को हंसकर टाल गए अपनी आवाज से गीतों में दर्द की शिद्दत पैदा करने वाले रफी साहब असल जिंदगी में उतने ही हंसमुख थे. 31 जुलाई को 11 बजे, जब दिल के दर्द से थोड़ी राहत मिली, तो फौरन स्टूडियो के लिए रवाना हो गए. उस दिन लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ फिल्म आसपास के इस गीत की रिकार्डिंग थी । वो गाना तो हमेशा की तरह बखूबी रिकार्ड हुआ, लेकिन जाने क्यों उस दिन रफी साहब को स्टूडियो से जाने की जल्दी थी. अमूमन वो सबके साथ ही निकलते थे, लेकिन उस दिन संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से कहा- तो अब मैं चलूं? रिकार्डिंग के लिए हमेशा तय वक्त से पहले पहुंचते थे, लेकिन रिकार्डिंग के बाद जाने की जल्दीबाजी कभी नहीं दिखाते. उस दिन रफी साहब के मुंह से वो अलफाज सुन लक्ष्मीकांत प्यारेलाल भी हैरान रह गए. सीने में उठे दर्द की बात रफी साहब ने उन्हें बताई नहीं थी. फिर भी, जाने कैसी उदासी थी उनकी आवाज में, जो संगीतकार जोड़ी को आशंका हुई। घर पहुंचते- पहुंचते रफी साहब के सीने का दर्द तेज हो गया। जब तक उन्हें अस्पताल ले जाया गया उनकी मौत हो गई। रफी साहब की मौत से पूरी फिल्म इंडस्ट्री सदमे में थी । शम्मी कपूर ने जब उनके मौत की खबर सुनी तो उनके मुंह से यहीं निकला कि मेरी तो आवाज ही चली गई। रफी साहब शम्मी कपूर के लिए गाने की बात सुनकर ही खुश हो जाते। याहू की तान इतनी पॉपुलर हुई, कि शम्मी कपूर अपनी हर फिल्म में रफी साहब से गवाने की जिद करते। यही नहीं, शूटिंग छोड़ रफी साहब को गाते देखने के लिए रिकार्डिंग स्टूडियो पहुंच जाते।  शम्मी कपूर कहते भी थे- रफी साहब को गाते देखने के बाद गाने पर अदाकारी में आसानी हो जाती है।  वो गीत गाते रफी साहब होते ही थे इतने हैप्पी मूड में   रफी साहब के साथ रिकार्डिंग का रंग ही कुछ और होता. अमूमन तो रफी साहब अपने सुर में गाते, तो म्यूजिक डाइरेक्टर्स भी अंतरा पूरा होने पर ही रोकते, लेकिन एक बार शम्मी कपूर ने एक गाने पर शर्त लगा दी. फिल्म ब्रह्मचारी का वो गीत था इस गाने का मुखड़ा और पूरा अंतरा रफी साहब ने एक ही सांस में गा दिया था। यही शम्मी कपूर की शर्त थी। उस दौर में रफी की आवाज ने शम्मी को ही नहीं राजेन्द्र कुमार को भी सुपरस्टार बना दिया, वो राजेन्द्र कुमार थे. राजेन्द्र कुमार की हर फिल्म में गाए रफी के गीत इतने हिट हुए, कि वो जुबली कुमार बन गए. इन गीतों के लिए राजेन्द्र कुमार हमेशा रफी साहब के लिए शुक्रगुजार रहे  

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